Analysis of information sources in references of the Wikipedia article "ब्रह्मचर्य" in Hindi language version.
ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् । ( ब्रह्मचर्य द्वारा कन्या युवा पति को प्राप्त करती है )
{{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link)ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् । अर्थ- ' कन्या ' षोडश वर्षानन्तर ब्रह्मचयंसे युक्त युवा पतिको प्राप्त करे ।
{{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link)भारतीय धर्मशास्त्रों में मन , वचन एवं कर्म से , सभी अवस्थाओं में , सर्व काल में " मैथुन " का परित्याग करना ही " ब्रह्मचर्य " कहा गया है । धर्मग्रन्थों में मैथुन आठ प्रकार के बतलाये गए हैं - स्त्री का स्मरण , कीर्तन , प्रेक्षण , केलि , गुह्य भाषण , संकल्प अध्यवसाय एवं क्रिया उक्त आठ प्रकार के...
{{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link)अष्ट मैथुन - पु ० = ( पूर्ण ब्रह्मचर्य पालन के लिए वर्जित ) आठ प्रकार के स्त्री- पुरुष - प्रसंग ।
{{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link){{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link){{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link){{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link)कामशास्त्र में संभोग के आठ अंग माने गए हैं — स्मरण , कीर्तन , केलि , प्रेक्षण , गुह्य भाषण , संकल्प , अध्यवसाय एवं क्रियानिष्पत्ति
{{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link){{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link)ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्यलाभः । (२/३८) ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा होने पर वीर्यलाभ होता है।
अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥30 ॥ भावार्थ अहिंसा , सत्य , अस्तेय , ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह- ये पाँच यम हैं ।
{{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link)यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ( ८ । ११ )
{{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link){{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link)ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते । 17.14 ब्रह्मचर्य, और अहिंसा आदि शारीरिक तप कहलाते हैं।
स्त्रियाँ भी आयुर्वेद सीखती थीं— सुश्रुतमें तो स्त्रियोंको रोगीके पास फटकनेका भी निषेध किया है , क्योंकि इनके दर्शनसे यदि रोगी में वीर्य नाश हो जाय , तो बहुत हानि करता है । [सुश्रुत सू. अ. १९/१४-१५ ]
{{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link)रक्त रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदः प्रजायते । मेदसोऽस्थि ततो मज्जा मज्ज्ञः शुक्रं तु जायते ॥ १० ॥ पाकजन्य प्रसाद भाग से क्रमशः -रस से रक्त , रक्त से मांस , मांस से मेद , मेद से अस्थि , अस्थि से मजा , मज्जा से शुक्र उत्पन्न होता है ।
{{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link){{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link){{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link)योग परम्परा में ' मरणं बिन्दु - पातेन ' कहकर बिन्दु पतन को मृत्यु तथा ' जीवनं बिन्दु - धारणात् ' कहकर बिन्दु धारण को जीवन की संज्ञा दी गयी है ।
{{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link)कहा गया है - ' मरणं बिन्दु पातेन , जीवनं बिन्दु धारणात् ' - बिन्दु के पात से मरण होता है और बिन्दु धारण से जीवन प्राप्त होता है ।
{{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link)' शिव संहिता ' में लिखा है- ' मरणं बिन्दु पातेन जीवनं बिन्दु - धारणात् ' अर्थात् ' वीर्य बिन्दु को गिराते रहने से मृत्यु हो जाती है और वीर्य बिन्दु की रक्षा करते रहने से जीवन बना रहता है । '
{{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link)मरण बिन्दु पातेन जीवन बिन्दु धारणात " अर्थात् वीर्य का बून्द गिरने से मरण और धारण से जीवन रक्षा होती है ।
{{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link){{cite book}}: CS1 maint: unrecognized language (link)